*ग़ज़ल*
बह्र 221 2121 1221 212
अरकान-मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईल फ़ाइलुन
शक होना लाज़िमी है अकारण लगाव पर
मरहम यहाँ लगाता न अब कोई घाव पर
फल देने से मुकर गए हैं सब लगाए पेड़
सो खेद आज हो रहा है रख-रखाव पर
हैं कुछ जो पाँच साल यहाँ सोए रहते हैं
बस देते ध्यान सिर्फ़ सुरा और चुनाव पर
है वक़्त बादशाह, ये राजा बनाता रंक
सो द्रौपदी भी अंत में लगती है दाव पर
बहना तो धीरे-धीरे ही बहना वगरना लोग
तटबंध बांँध देते हैं अतिशय बहाव पर
गर सहल होता याँ क़ज़ा से पार पाना तो
हम सबको एक साथ बिठा देते नाव पर
सारी गणित बदल गई इक माँ के जाने से
तालीम लेना व्यर्थ है अब याँ घटाव पर
©® संदीप डबराल सैंडी 'शून्य'
Sundar
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