" मैं तुम्हारा होना चाहता हूं। "


 एक तुम हो....

मुझे तुम्हारे पास होना कभी जायज़ नही लगा ...

नहीं ऐसा नहीं के मै कभी तुम पर ओस की तरह ठहरा नही ...

तुम्हारे बूंदों को बस हाथो से फिसलने दिया हो ...  कोई और भी होगा मेरे बाद तुम्हारे इंतज़ार में....

तुम्हारे साथ कुछ और वक्त साथ गुजारने के ख़्याल में...

मैंने कभी तुम्हारे अस्तित्व को खुद में इतना महसूस नहीं किया जीतना आज कर रहा हूं .... तुम्हारे पास बैठे हुए ...

मै हमेशा तुम्हारे सूखने के क्षण को ....

सूखने से पहले जी लिया करता हूं ... सूखे के पहले का जिया हुआ .... तुम पर बसी ओस की परत को महसूस कराता है ...

सपनों में जीया हुआ साथ जीना उतना ही कठिन है ...

जीतना तुम्हें बढ़ने से रोकना ...

तुम कहना तुम मेरे साथ हो ... और मै ये मान लूंगा

फिर कहना तुम्हारे साथ के बावजूद मैं भाप सा दिखूंगा... और तुममें मै कभी भी दिख जाऊंगा .... जिसे तुम घाट दर घाट छोड़ते चली जा रही हो ...

क्या हम हर छोड़ जाने को पा लेने से बदल नही सकते ...

क्या जब तुम्हें मै हाथो में थामूंगा तो तुम अपने स्पर्श से साथ नही रहोगी ...

क्यों हम कभी उन क्षणों को पूरी तरह जी नही पाते जिन्हे हम जीने का सपने देखते है ...

अगर तुम धारा हो तो मैं उस पर बिछी परत हूं ...

क्या मिलोगी नही इस घाट से गुजरने से पहले ..

मै कभी तुम्हें बता नही पाया 

कभी कभी मैं तुम होना चाहता हूं 

कभी कभी मैं बनारस का घाट होना चाहता हूं ....

तुम्हारे साथ भी ... और मेरे पास भी .....

   

    ~अमन वर्मा


       

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