बैठा हूं और मुझे तुम याद आ रही हो...फिर ऐसे में पहले वाले कवि मन में उद्गार हुआ है और कविताएं लिखने व पढ़ने का मन कर रहा है! मैंने कभी जाना ही नहीं कि कविताएं पढ़ी व लिखी जाती है मुझे लगा कि हम कविताएं जीते है क्योंकि तुम मेरे साथ हो! पर तुम दूर होके भी साथ हो क्योंकि मेरा मन गीत चतुर्वेदी का मन है जिसकी कविता के एक चप्पल अपने दूसरे पैर की चप्पल की तलाश में रहता है,मेरा मन अज्ञेय का मन है जो अकेलेपन को बिना चुने,स्वीकृत अकेलेपन में भी तुमको खोजने का कार्य करता है,मेरा मन नरेश सक्सेना का मन है जिसको भली भांति पता कि मनुष्यों का गिरने का कोई नियम नहीं होता फिर भी तुमको अपने कंधे पर चढ़ा के रखना चाहता है,मेरा मन शमशेर बहादुर सिंह का मन है जो जानता है कि सारी कला कृति एक-दूसरे में समोई हुई है इसलिए तुम्हारे मन के अंदर झांकना चाहता है, मेरा मन रघुवीर सहाय का मन है जिस मन में पानी के अनेक संस्मरण है जो बूंद-बूंद करके तुम्हे बताना चाहता है,मेरा मन वीरेन डंगवाल का मन है जो जानता है कि प्यार उसे छोड़ेगा नही खुश करके तबाह कर देगा,इसके बावजूद भी वो अपनी तबाही में भी तुम्हारे साथ होने से मिलने वाली खुशी चाहता है,मेरा मन आलोक धन्वा का मन है जो तुमसे मिलने के बाद भी अगली बार कब मिलेंगे की इच्छाओं के बीच फंसा हुआ है,मेरा मन अशोक वाजपेयी का मन है जिसको पता है कि आत्मा शरीर का अनंत स्वपन देखती हैं और ऐसे में वह अपनी आत्मा का स्वपन तुमको बनाना चाहता है और अंत में मेरा मन केदार नाथ सिंह का है जिसको पता की जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है फिर भी तुमको खुशी खुशी जाने देता है इस आशा में की तुम लौटोगी!
क्योंकि
“मन होता ही ऐसा है जैसे सफेद फूल!”🌼🌼
~मयंक मिश्र
@_maya_ank_
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