" तेरी नाराज़गी "


 शिकायतों से भरी नाराज़गी की पोटली,

चंद पलों में मुस्कुराहटों में बदल गई।

तेरी बिखरी ज़ुल्फें समेटते-समेटते,

मेरी बिखरी-बिखरी शाम सम्भल गई।


लाल गुलाबी जामुनी आसमानी सब रंग फैलाये उसने,

जो तितली तेरे हाथों को छूकर निकल गई।

तेरी मोहब्बत की ओस जैसी चमक देखते-देखते,

सुबह की पहली किरण भी, सूरज के हाथों से फिसल गई।


बड़ी खोज के बाद लाया था, ख़ामियाँ निकालकर तेरी,

तुने बस मुस्कुरा दिया, वो सब अंदर ही अंदर पिघल गई,

नाव में बैठकर तूने हाथ जो ना लगाया पानी को,

तुझे छूने को, एक लहर कश्ती तक उछल गई।


मतला पढ़ा था एक जगह, कहीं और पढ़ा मक़्ता,

तेरा तख़ल्लुस लिए सफ़र पे मेरी एक ग़ज़ल गई,

तेरी बिखरी ज़ुल्फ़ समेटते-समेटते

मेरी बिखरी-बिखरी शाम सम्भल गई।


      ~प्रशांत 


तखल्लुस- शायर का नाम (Pen Name)

मतला- ग़ज़ल का पहला शेर जिसमे गजलकार पूरी ग़ज़ल की एक झलक देता है।

मख्ता- ग़ज़ल का आखरी शेर, जिसमे गजलकार अपना नाम भी इस्तेमाल करते है।

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