"तुम कैसे रह लोगी मेरे बिना? कैसे कर सकती हो यार ऐसा ?"- रोते हुए रचित संध्या से वो सवाल पूछ रहा था जिसका जवाब दे पाना संध्या के लिए मर जाने जैसा था।
"मुझे तुमसे प्यार करने के लिए तुम्हारे साथ रहने की ज़रूरत नहीं हैं। बस एक छोटा सा कोना हो मेरे दिल में, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारा हो। हर सुबह कुछ मीठी याद हो तुम्हारी, बिल्कुल चाय की चुस्की सी। और जब अख़बार पढ़ूं तो तुम्हारी जैसी हो जाऊ। तुमसे इश्क़ जताने के लिए मुझे तुम्हारा हाथ नही चाहिए। बस एक धुंधुली सी याद में बनी तुम्हारी तस्वीर हो जिसमें तुम हंसते हुए मुझे तंग करते हुए दीखो। बस इतना आसान तो है तुम्हारे बिना नहीं, तुम्हारे साथ जीना।" - संध्या ने ढाढस बंधाते हुए रचित को ऐसे कहा मानो वो खुद को भी समझा रही हो।
" छोटी दरवाज़ा खोल बारात आ गईं हैं।"
~ शेफालिका
कितना मार्मिक है ये❣️
जवाब देंहटाएंउफ्फ ..
जवाब देंहटाएंJitni tarif kare utni kam h,
जवाब देंहटाएंBhot mast likhte h 🔥🔥🔥
Just wondering the beauty of this excerpt
जवाब देंहटाएंDil ko chhu lene Vali baat kahi h
जवाब देंहटाएंBahut himmat wali ladki hi Aisa soch sakti h
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