तोहफ़ा


  "तोहफ़ा " जिसका नाम सुन के ही मन में जिज्ञासा के उफान उठने लगते हैं और मन गुदगुदाना शुरू कर देता है और एक तीव्र इच्छा जगाने लगती है कि क्या होगा और कब देख सकेंगे। और यदि उसे किसी खास ने दिया हो तो दिल के तार को ऐसे छेड़ता है कि उसकी झनझनाहट की कंपन पूरे शरीर में महसूस होती हैं।

बात कुछ बीते महीने की ही है। सारा दिन साथ में रहने के बावजूद भी हम दोनो व्यस्त रहे फिर जब सूरज की लालिमा छटने लगी और दिन भी सुस्ता गया तो हमने थोड़ा समय खुद के लिए निकाला। मैं उनके साथ उनकी मोटर साइकिल के पीछे बैठी थी। और हम दोनो एक लम्बे सफर के लिए साथ चल दिए थे। यूं तो वो हमेशा तोहफ़े देने में बाज़ी मार लेते है पर उस दिन वो तोहफ़ा कुछ ज्यादा खास था। उन्होंने मुझे अपने बैग में से कुछ निकलाने को कहा। और मैने चैन खोली और वो समान निकाल के दे दिया। पर उन्होंने जो देखने के लिए कहा वो नहीं देखा। तो उन्होंने फिर कहा,

 " सिया, ध्यान से देखिए कुछ रखा है इसमें"।

मैं उनके साथ इतनी बावरी हो जाती हूं कि कुछ नजर ही नही आता तो मैने भी कहा, " क्या है अर्पित , मुझे तो नहीं दिख रहा"। 

फिर थोड़ा देखने बाद एक तस्वीर हाथ लगी। कांच के खाके में सजी तस्वीर, जिसे देख मैं कुछ समझ नहीं पाई बस आखों से आसू बहने लगे और मैने उन्हें जोर से जकड़ लिया। शायद  आसूं मेरे सभी जज्बातों को बयां करने के लिए काफी थे। उस  तस्वीर में मैं और वो थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे उनके घर में उनके दादा -दादी , मां- पिता जी की हैं।

मुझे उनके दिल में, उनके परिवार वालो के दिल में पहले ही जगह मिल चुकी थी पर उस दिन घर की दीवारों ने भी मुझे अपना बना लिया था।

- शेफालिका 

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